Friday, 2 February 2018

ऊंचाइयां- The Destination of loneliness

ऐ खुदा मुझ को अब,
ऊचाइयां देना नहीं,
बरकत अदा करना बस,
मुझे,आफताब करना नहीं।

ऊँचें पहाड़ों पर भी,
बस बर्फ होती है जमा,
हरियाली होती नहीं वहां,
निर्जनता बसती केवल वहां।

ऊँचें खजूर की अपनी व्यथा,
छाया तक मिलती नहीं यहाँ,
फल का पता तो कुछ नहीं,
टकराती हवा भी देती डरा।

Thursday, 12 October 2017

Climate Change


Many trees are getting cut,

Animal’s habitat are getting shut,

We are losing pure breathing air,

This is really, not fair.



We are filling Earth with pollution,

We need to find some solution,

AC, car and planes are making damage,

How can we ever manage?



We are disturbing season cycle,

We need to do some revival,

We careless people causing damage,

How can we stop this phase?








Use feet or cycle, say bye to wheels

Grow the trees, reap the Earth green.

Monday, 3 July 2017

जी एस टी

जी एस टी आज भारत में सबसे ज्यादा चर्चित और कौतूहल का विषय हैं। सरकार ने भी जी एस टी को आज़ादी के बाद के सबसे बड़े कर सुधार के रूप में प्रस्तुत कर इसके प्रति लोगों की उत्सुकता को मानो पर लगा दिए हैं। वैसे भी भारत देश में नागरिक अनगिनत टैक्सों के जाल से घिरा सा हुआ था। इस माहौल में एक देश एक टैक्स टैगलाइन ने विगत एक महीने में लगभग हर मन पर दस्तक दे दी हैं।

जी एस टी सरकार द्वारा तैयार उस दवाई की पुड़िया की तरह है, जिसे लेने से अनगिनत और दवाई की पूड़ियों से मुक्ति मिल सकती हैं। केंद्र सरकार अभी तक अलग अलग वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त सीमा शुल्क, विशेष अतिरिक्त शुल्क वगैरह वगैरह टैक्स लगाए जाते थे और सेवायों पर सेवा कर लगाया जाता था। वही राज्य सरकारों द्वारा केंद्रीय बिक्री कर, वैट, खरीद कर, मनोरंजन कर, चुंगी, लाटरी टैक्स, प्रवेश कर न जाने कितने ही और टैक्स लगाए जाते थे। इस सब के बाद भी केंद्र एवं राज्य सरकारों के और सेस या अधिभार भी लागू होते थे। जी एस टी इन सभी का इकलौता विकल्प बन कर सामने आया हैं। अब हर वस्तु और सेवा पर एक टैक्स जी एस टी लगेगा और प्रत्येक वस्तु पर इसकी दर पूरे भारत मे एक ही रहेगी। अतः यह टैक्स सम्पूर्ण भारत को एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार के रूप में स्थापित कर देगा और दोहरे कराधान की समस्या पर करारी चोट करने का मुख्य औज़ार बनेगा।

जी एस टी प्रक्रम में तय पांच दरों 0%, 5%, 12%, 18% एवं 28% ने आम उपभोक्ता पर कारों के बोझ में कमी का रास्ता प्रशस्त किया हैं। वर्तमान की तरह ही जी एस टी प्रक्रम में भी एक्सपोर्ट यूनिट्स के लिए विशेष सुविधाएं बानी रहेगी। एक्सपोर्ट आइटम पर देश के अंदर लगे हुए सभी टैक्स का रिफंड देने की सुविधा दी गयी हैं। आयात के मामले में भी आयातित वस्तु पर सीमा शुल्क के अलावा उतना ही जी एस टी लगेगा जितना जी एस टी उस वस्तु के लिए भारत में नियत किया गया हैं। जी एस टी प्रक्रम में सभी व्यवसायियों चाहे वो व्यापारी हो या उत्पादक सभी को एक ही तरह की टैक्स प्रक्रिया करनी पड़ेगी। उसमे भी 20 लाख से ज्यादा टर्नओवर वाले व्यवसायियों को ही जी एस टी रजिस्ट्रेशन कराने एवं टैक्स देने की आवश्यकता है।

जी एस टी में हर व्यवसायी को महीने में एक बार रिटर्न भर कर टैक्स चुकाना होगा। चूँकि रिटर्न भरने की प्रक्रिया पूर्णतः ऑनलाइन हैं, अतः किसी भी माल या सेवा के ऊपर जो भी टैक्स लगता है उसमें खरीदारी पर लगा हुआ टैक्स का इनपुट टैक्स क्रेडिट स्वतः ही व्यापारी को मिल जाता है। जी एस टी नेटवर्क के द्वारा दी गई एक्सेल शीट में हिसाब रख कर, इसे सीधे एक ऑफलाइन टूल की सहायता से रिटर्न में बदला जा सकता हैं।

जो व्यापारी अपना सामान सीधा उपभोक्ता को बेचता है तो उसे केवल सामान की दर सहित टर्नओवर दिखाना होगा। और यदि कोई व्यापारी जिसका टर्नओवर 50 लाख तक है वो कम्पोजीशन स्कीम का फायदा उठा सकता हैं जिसके तहत उसे तीन महीने में कुल टर्नओवर दिखाते हुए रिटर्न भरना होगा। लेकिन जो व्यापारी दूसरे व्यापारी को माल बेच रहा हैं, उसे बिक्री के हर इनवॉइस की जानकारी रिटर्न में देनी होगी। व्यापारी से व्यापारी माल बिक्री के व्यवस्था में इनपुट टैक्स क्रेडिट रिवर्सल यानी व्यापारी को मिली इनपुट टैक्स क्रेडिट को लौटाने की व्यवस्था भी दी गयी हैं।

जी एस टी टैक्स व्यवस्था चूंकि पूर्णतया ऑनलाइन हैं, अतः यह एक पारदर्शी व्यवस्था हैं। यह भारत की अर्थव्यवस्था के शुद्धिकरण का एक महत्वपूर्ण औज़ार साबित हो सकती हैं। इस प्रक्रम के साथ साथ हमे भी अपने प्रत्येक व्यापारिक गतिविधि के निष्पादन में शुद्धि बरतनी चाहिए, तभी हम जी एस टी का पूर्ण लाभ फलित होते हुए देख पाएंगे।

Saturday, 10 June 2017

किसान

इस कृषि प्रधान देश में जब किसान आंदोलन या किसान की मौत होती है तो मन विचलित हो जाता हैं। सोचने की बात हैं कि हम किस प्रगति की बातें हांक रहे हैं। बचपन मे पढ़ाया जाता था कि भारत एक कृषि प्रधान देश हैं जिसकी 80% जनसंख्या कृषि पर निर्भर हैं। आज ये आंकड़ा महज 52% पर आ कर अटक गया हैं। कृषि क्षेत्र घट रहे हैं और कृषक भी। एक लेख पड़गा था अभी की आज भी विभिन्न फसलों के दाम दस वर्ष पूर्व के दामों से दुगुना भी नहीं हुए है वहीं आय से लेकर अन्य सामानों के दाम कई गुना बढ़ गए हैं। बात सच भी हैं। पर क्या कारण है कि किसानों को आजादी के इतने वर्षों के बाद भी जायज हक नहीं मिल पाया। उसमे भी ताज्जुब यह है कि पहली संसद से लेकर आज तक हर संसद में पहुंचे हुए जन प्रतिनिधियों के एक बहुत बड़े हिस्से का राजनीति के अलावा केवल कृषि व्यवसाय रहा है। भारत में राजनीति तो केवल जनता की सेवा मात्र है, उससे कुछ कमाना तो लानत हैं। अब केवल कृषि व्यवसाय पर निर्भर रहकर न जाने कितने ही जन प्रतिनिधि अपनी संपत्ति को कितने सैंकड़ो गुना कर चुके हैं। वहीं आम किसान पता नहीं क्यों अपने परिवार को पालने में असमर्थ रहे हैं और अपनी जान देते रहे हैं। बात हिसाब रखने की हैं। जब तक एकाउंटेबिलिटी नहीं होती, तब तक उस मुद्दे पर कोई वार्तालाप भी नहीं होता हैं। इसी आड़ में बाहुबली किसान अपनी टैक्स फ्री कृषि आय साल दर साल कई कई गुना बढ़ाते हुए तंत्र से भी ऊपर निकल गए हैं वहीं उसी कृषि क्षेत्र के दूसरे किसान अपने परिवार को पाल भी न पाने की स्थिति से दो चार हो कर अपनी जान देने को विवश हो जाते हैं। काश वो बाहुबली किसान अपनी सफल कृषि तकनीकी जैसे बीज चयन  से लेकर खाद, सिचाई की उन्नत तकनीकी का राज अन्य किसान भाइयों से भी साझा कर लेते तो , शायद ये दिन न देखना पड़ता। फिर एक बात ये भी ख्याल में आती है कि जो कृषि से लगातार लाभ प्राप्त करते हुए अकूत संपत्ति जोड़ पा रहे हैं ऐसे तथाकथित किसानों से टैक्स वसूल कर गरीब किसानों के लिए कोई फण्ड बना देना चाहिए, ताकि भविष्य में किसानों की जान  की आहुति को रोका जा सके ।

Tuesday, 23 May 2017

मिलनसार

एक वृद्ध लंगड़ाते हुए अपनी दुकान की तरफ बढ़े चले जाते थे।थोड़ा हाँफते हुए , थोड़े थोडे अंतराल पर बैठते बैठाते अपना रास्ता नाप लेते थे। उनके भाई का बेटा राजु रोज उनके समानान्तर अपनी बाइक दौड़ाता हुआ निकल जाता था। फिर एक दिन वृद्ध बीमार होकर खटिया पर लेट गए। लगने लगा कि वो बस चंद दिनों के मेहमान है। वृद्ध को अस्पताल में भर्ती करवाने में राजू मुख्य मददगार था। ये बाय और कि उसे तीमारदारी से कोई सरोकार नहीं था। तीन दिनों बाद, वृद्ध दुनिया छोड़ गए। राजू कंधे देने वालों में सबसे आगे था। उसने मृत्यु पश्चात की रस्मों से लेकर भोज तक की सारी व्यवस्थायों में अपनी जी जान लगा दी। आखिर में सभी ने कहा कि राजू जैसे मिलनसार युवा समाज मे विरले ही बचे हैं।

Tuesday, 9 May 2017

बिकाऊ बनो

आज का युग भौतिकतावादी मूल्यपरक युग हैं। इस मूल्यपरक युग मे हर वस्तु, यहां तक की मनुष्य भी मूल्य के द्वारा आंका जाता हैं। यूँ तो सदा से ही समाज मे मूल्य निर्धारण होता रहा है। लेकिन वर्तमान में सामाजिक मूल्यों को पूर्णतया नकार कर समाज पूर्णरूपेण मूल्यपरक हो चुके हैं। समाज बाजारू संस्कृति पर संचालित होने लगे हैं, जहां महंगी वस्तु का मतलब अच्छा होने से हैं। यहां समाज का परिप्रेक्ष्य सीमित न होकर पूर्णतया विस्तृत हैं। पूरे देश मे बिकाऊ होना सफलता का मूल सूत्र हो गया हैं। जप बिकने में सफल हो गया, समझो वहीं सच मे चर्चित है, सफल हैं।

आज बिकाऊ होना उतना ही जरूरी हैं, जितना खाने में नमक का होना। यदि आप बिकाऊ हैं, तो समाज को आपसे सरोकार हैं, अन्यथा न जाने कितने ही कुकुरमुत्ते बरसात में उगते है और खत्म हो जाते हैं। लेकिन बिकना भी इतना आसान नहीं है। आज बिकाऊ होने के लिए लगातार मूल्य वृद्धि (वैल्यू एडिशन) की आवश्यकता हैं। नए नवेले बिकाऊओ के लिए तो बिकना और भी मुश्किल हैं। लेकिन जिधर देखो, वहां बिकाऊओ के लिए दलाल तंत्र तैयार हैं। बिकाऊओ का बाजार पूर्णतया तैयार हैं। चाहे आप नौकरी करने के लिए स्वयं को बेचना चाहते हो या शादी के बाजार में, दलाल तंत्र हर जगह मौजूद हैं। आप स्वयं बिक रहे हैं, तो अच्छा हैं अन्यथा आप स्वतः बिक जाएंगे या फिर कबाड़ी माल की तरह खाप जाएंगे।

व्यवसाय या नौकरी के क्षेत्र में, 'बिकाऊ बनो' का एक उज्ज्वल  तार्किक पक्ष हैं। आज के समय मे आप को अपने आप को बिकाऊ बनाना ही होगा, अपने अंदर समाज में आवश्यक सफलता के गुणों को समाहित करके। आज इतनी प्रतिस्पर्धा है कि यदि आप कुछ अलग नहीं, तो आपकी परवाह भी किसी को नहीं। व्यवसाय में आज वस्तु नहीं बिकती, वरन उसके साथ व्यापारी को भी बिकना होता हैं।यहां इसका स्पष्टतया अर्थ है कि व्यवसायी को बहुत व्यवहारिक, मधुर व क्रेतान्मुखी (कस्टमर ओरिएंटेड) होना अत्यन्य जरुरी हैं। आज समाज मे इतना दलाल तंत्र है कि आप के बिकाऊ होने में इनका योगदान होने को नकारा ही नहीं जा सकता हैं। कहीं इनका नाम प्लेसमेंट एजेंसी है तो कहीं जॉब ब्यूरो, लेकिन ये प्रभु समान सर्वव्याप्त हैं। अतः मूल मंत्र है कि 'बिकाऊ बनो', चाहे अपने बूते पर या फिर दलाल तंत्र की बैसाखियों पर।

शादी के बाजार में भी बिकाऊ दूल्हों की मांग है, जो बिकना नहीं चाहते, उनमे समाज कुछ न कुछ खोट ढूंढ ही लेता हैं। नैतिकता और मूल्यों का स्थान पैसे से भरने की समाजों की कोशिशें लगातार प्रचारित व प्रसारित हो रहीं हैं।परिचय सम्मेलन लगभग हर समाज के फैशन शो हो गए है, हालात यहां भी वहीं है, बिकाऊ माल केवल आयोजक हैं और न बिकने वाले माल की नुमायश एक सम्मेलन से दूसरे सम्मेलन तक हो रही हैं व सिलसिला चला जा रहा हैं। तो अच्छा है कि 'बिकाऊ बनो'।

Friday, 21 April 2017

गोवर्धन परिक्रमा : एक अलौकिक यात्रा

गोवर्धन एक जन मानस की आस्था का केंद्र हैं. गोवर्धन ब्रज क्षेत्र में अवस्थित एक छोटी सी पर्वतमाला हैं. इसके बारे में किवंदती है की इसे भगवान श्री कृष्ण ने द्वापरयुग में अपनी बाल लीलाएं करते हुए अपनी छुटकी अंगुली पर उठाकर देवराज इंद्र के दंभ का नाश किया था. कहा जाता है की पांच हजार वर्ष पूर्व यह गोवर्धन पर्वत तीस हजार मीटर ऊंचा होता था, जो पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण तिल तिल घटते हुए आज मात्र तीस मीटर ही ऊंचा रह गया हैं. गोवर्धन के नजदीक का होने के कारण मेरा सदा गोवर्धन जी के लिए के नजदीकी स्थान रहा है. अतः गोवर्धन परिक्रमा में शामिल होने के निमंत्रण मात्र से मेरा मन झूमने लगा था. यूं तो दूरी वश एवं तेज पड़ती गर्मी किसी भी यात्रा के विचार को नेस्तनाबूद करने के लिए पर्याप्त थी, लेकिन गोवर्धन परिक्रमा एक अलौकिक यात्रा का विचार था जो अपने आप पूर्ण होने जा रहा था.

गोवर्धन परिक्रमा को दो भागों में विभाजित किया जाता हैं, जिसके मध्य में गोवर्धन दान घाटी मंदिर है. गोवर्धन दान घाटी से आन्यौर, पूछरी, जतीपुरा होते हुए पुनः गोवर्धन आने की परिक्रमा बड़ी परिक्रमा कहलाती है, जो की लगभग बारह किलोमीटर की होती हैं. वहीँ गोवर्धन से उद्धव कुंड होते हुए राधा कुंड, मानसी गंगा होते हुए पुनः गोवर्धन आने की परिक्रमा छोटी परिक्रमा कहलाती हैं, जो की लगभग नौ किलोमीटर की हैं. वैष्णव संप्रदायी लोग सामान्यतः अपनी परिक्रमा गोवर्धन दान घाटी मंदिर से ना आरम्भ करके, मुखारविन्द जतीपुरा से प्रारंभ करते हुए पुनः जतीपुरा पहुँच कर अपनी परिक्रमा पूर्ण करते हैं, जिसका अनुसरण हमने किया.

आज के समय एक निश्चित तय समय पर इक्कीस लोगों (बच्चों सहित) का एकत्रित होने लगभग नामुमकिन हैं, जो गोवर्धन महाराज की इच्छानुसार पूर्ण हो रहा था. हम सभी परिवारजन श्री अम्बेडकर जयंती के अवसर पर छुट्टी का लाभ उठाते हुए जतीपुरा एकत्रित हो गए. जतीपुरा के मुखारविंद मंदिर के समीप एक रिहायशी ठिकाने को हमने गिरधर नगरी में अपना अस्थायी आशियाना बना लिया. तपती गर्मी के मद्देनजर हमने अपनी गोवर्धन परिक्रमा के आगाज़ का समय सांय आठ बजे का तय किया. तय समयानुसार सांय साढ़े सात बजे मुखारविंद पर आरती में शामिल होने के साथ ही हमने गोवर्धन बाबा, गिरिराज धारण, मुखारविंद, कृष्ण कन्हैया लाल आदि आदि जयकारों के उदघोष के साथ परिक्रमा का शुभारम्भ किया. बच्चों के साथ के कारण हमने एक रिक्शा को अपने साथ ले लिया जिसमे हमने पानी, कपडे वगैरह दुसरे सामान भी रख लिए. श्रद्धानुसार मुझ सहित कुछ परिवारजनों ने नंगे पाँव ही परिक्रमा करना स्वीकार किया. हमारे साथ ही बच्चों का भी परिक्रमा के लिए जोश देखते ही बनता था.

जतीपुरा वल्लभ संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र रहा हैं. श्री वल्लभाचार्य एवं विट्ठल नाथ जी की यहाँ बैठके हैं. यहाँ श्रीनाथजी का प्राचीन मंदिर हैं, जो अब जीर्ण शीर्ण अवस्था में हैं. कहा जाता है की अष्टछाप के महा कवि एवं भक्त शिरोमणि सूरदास यही कीर्तन किया करते थे.
इक्कीस किलोमीटर लम्बी परिक्रमा लगाना अन्य किसी व्यायाम या मैराथन से भी दुष्कर प्रतीत होता हैं और विशेषतः तब जब वह परिवार के साथ की जाए. सबकी शारीरिक क्षमताओं का संतुलन बैठाते हुए लय बनाये रखते हुए परिक्रमा को पूर्णता की ओर ले जाना भी एक कला जैसा हैं. राह में यहाँ वहां अनेकानेक श्रद्धालु दंडवत परिक्रमा भी कर रहे थे, जिनकी श्रद्धा किसी को भी विस्मृत कर सकती हैं. लेकिन यहीं उदाहरण हैं की श्रद्धा की कोई सीमा नहीं होती हैं, और जब श्रद्धा आपके मन में हो तो, कोई भी शारीरिक बंधन आपके आड़े नहीं आ सकता हैं.  इन श्रद्धालुयों का भाव ही था जो हमारे मन में भी जोश भर रहा था.
किलोमीटर दर किलोमीटर, भजन-कीर्तन करते हुए, यदा-कदा बतियाते हुए और समय समय पर जयकारों से जोश भरते हुए हम परिक्रमा पथ पर बढे जा रहे थे.
चूंकि हमने परिक्रमा जतीपुरा से प्रारंभ की थी, तो हमारी बड़ी परिक्रमा जतीपुरा से दानघाटी की हो गयी जो लगभग तेरह किलोमीटर होती हैं.  मध्य में मुख्य पड़ाव, राधाकुंड एवं मानसी गंगा थे. राधाकुंड के बारे में मान्यता है की यहाँ श्री कृष्ण ने अष्ट सखियों संग महारास रचाया था. राधाकुंड के बारे में यह भी कहा जाता है की अगर निस्संतान दंपत्ति यहाँ एक साथ स्नान करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति का आशीर्वाद अवश्यम्भावी हैं. राधाकुंड के बगल में ही श्री कृष्ण कुंड है जिसकी बनावट श्री कृष्ण की तरह की बांकी यानि टेढ़ी हैं. राधाकुंड पर हमने भी राधा जी एवं कृष्ण के अगाध प्रेम को याद करते हुए अपनी मनोकामनायों को ह्रदय में दुहराते हुए दीप प्रज्वलन कर पूजा अर्चना की.  
वही मानसी गंगा के बारे में मान्यता है की इसे कृष्ण भगवन ने अपने मन से उत्पन्न किया हैं. किंवदती है की एक बार नन्द बाबा और यशोदा मैया ने गंगा जी की यात्रा का विचार जताया और जाते जाते थक जाने पर श्री कृष्ण ने अपने मन के विचार मात्र से गंगाजी का आवाहन गोवर्धन में कर दिया. यहाँ की गयी मनौती कभी विफल नहीं जाती.
परिक्रमा मार्ग में अन्य पड़ावों में उद्धव कुंड, कुसुम सरोवर इत्यादि भी हैं. जहाँ श्री कृष्ण से साक्षात्कार के साथ की उत्कृष्ट स्थापत्य का नमूना भी देखने को मिलता हैं.
दान घाटी पर रात्रि परिक्रमा के मद्देनजर भगवान की सुन्दर छवि के दर्शन तो संभव नहीं थे अतः हम भगवान को सुमिरते हुए छोटी परिक्रमा की और बढ़ चले. अब कुछ बच्चे गोदियों में चढ़ कर नींद निकालते हुए परिक्रमा पथ पर अग्रेसित थे तो कुछ अभी भी जोश से सरपट दौड़े जा रहे थे. कुछ बच्चे यदा कदा रिक्शा से भी परिक्रमा का लाभ उठा रहे थे. दान घाटी से जतीपुरा की परिक्रमा के मुख्य पड़ाव आन्यौर एवं पूछरी का लौठा हैं. पूछरी के लौठा के बारे में मन जाता है की श्री गोवर्धन का आकार एक मोर के सदृश हैं एवं श्रीराधाकुंड उनकी जीभ एवं श्री कृष्ण कुंड चिवुक हैं , ललिता कुंड ललाट हैं. वही यह पूछरी, नाचते हुए मोर के पंखों – पूँछ के स्थान पर अवस्थित हैं अतः इसका नाम पूछरी हैं. यहाँ यह भी किंवदती है की लौठाजी भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र थे, जिन्हें श्री कृष्ण ने मिलने आने का वचन दिया था. और लौठाजी आज भी वही मंदिर में भगवान श्री कृष्ण से मिलने का इन्तजार करते हैं.
पूछरी से आगे चलते हुए, पैर लगभग जवाब देने लगे थे. लेकिन गोवर्धन महाराज की श्रद्धा ही शायद भक्तगणों को आगे खींच रही थी. जतीपुरा पहुँच कर भक्तगणों ने गोवर्धन महाराज को धन्यवाद देते हुए परिक्रमा को विराम दिया. सभी ने विश्राम किया.
परिक्रमा की पूर्णाहुति के रूप में मुखारविंद जतीपुरा पर गोवर्धन महाराज के भोग व विशेष पूजा अर्चना का नियत था. सभी परिवारजनों ने एक साथ गोवर्धन महाराज को दुग्ध स्नान एवं भोग अर्पण किया. गोवर्धन बाबा के जयकारों, भजन कीर्तनो एवं बैंड बाजों के साथ ने इस पूजा को अविस्मरणीय बना दिया. गोवर्धन बाबा से सामीप्य हमारे दिलों में हिलोरें मार रहा था. सभी के चेहरों पर एक अलौकिक चमक प्रत्यक्षतः गोवर्धन महाराज के आशीर्वाद का प्रत्यक्ष अनुभव करा रहा था. गोवर्धन बाबा के प्रसाद को प्राप्त करके हम सभी कृतज्ञ मन से गोवर्धन बाबा को धन्यवाद देते हुए अपनी जिंदगी की उहापोह का सामना करने पुनः निकल पड़े.

संतुलन- the balance

संतुलन व्यवस्था का दूसरा नाम हैं। संतुलन तराजू के दोनों सिरों के एक तल पर होने का भाव हैं। जीवन में भी संतुलन का महत्व हम सभी महसूस करते हैं...