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Tuesday, 26 November 2019

नारी : My Story

ये कोना या वो कोना,
बस एक छुपा हुआ सा भेद भाव,
न जाने कितने अजन्मे क़त्ल,
न जाने कितने गूढ़ रहस्य दफ़न,
कारण बस इतना सा की, मैं नारी हूँ,
मानो हर कदम बस, मैं हारी हूँ.

हूँ किस जीवन की मैं अधिकारी,
सुन्दर नहीं हैं इसकी कहानी,
कुछ खुश हूँ या आनंदित हूँ,
बस कमाने या खपाने में व्यस्त,
रहती हूँ मानो किराये पर,
सोने की चिरैया नहीं हैं हम,
हम रोती सी चिरैया, अनसुनी भर.


जिंदगी हमारी की बस यही हैं कहानी,
जिंदगी हमारी बस बेमानी,
हर दर पर बस व्यापार भर,
हर कोई चाहे सुन्दर रूप, गुण, लक्षण
हम यहीं देने भर तैयार हैं हर पल.

सोचती हूँ,
क्यूँ परियां केवल स्वर्ग तक सीमित,
क्यूँ धरती पर उनका हैं प्रतिबंधन,
क्यूँ नारी शिक्षा की अधिकारिणी नहीं,
क्यूँ ये आज भी मजबूत कन्धा नहीं,
क्यूँ ये जन्मने के लिए भी मोहताज.

बूँद बूँद से भरता हैं घड़ा,
न भर सकता ये ओसों से,
है मानस मन जाग जा अब भी,
क्यूँ खोता स्वर्ग विचरने से.


Friday, 2 February 2018

ऊंचाइयां- The Destination of loneliness

ऐ खुदा मुझ को अब,
ऊचाइयां देना नहीं,
बरकत अदा करना बस,
मुझे,आफताब करना नहीं।

ऊँचें पहाड़ों पर भी,
बस बर्फ होती है जमा,
हरियाली होती नहीं वहां,
निर्जनता बसती केवल वहां।

ऊँचें खजूर की अपनी व्यथा,
छाया तक मिलती नहीं यहाँ,
फल का पता तो कुछ नहीं,
टकराती हवा भी देती डरा।

Thursday, 12 October 2017

Climate Change


Many trees are getting cut,

Animal’s habitat are getting shut,

We are losing pure breathing air,

This is really, not fair.



We are filling Earth with pollution,

We need to find some solution,

AC, car and planes are making damage,

How can we ever manage?



We are disturbing season cycle,

We need to do some revival,

We careless people causing damage,

How can we stop this phase?








Use feet or cycle, say bye to wheels

Grow the trees, reap the Earth green.

Monday, 3 July 2017

जी एस टी

जी एस टी आज भारत में सबसे ज्यादा चर्चित और कौतूहल का विषय हैं। सरकार ने भी जी एस टी को आज़ादी के बाद के सबसे बड़े कर सुधार के रूप में प्रस्तुत कर इसके प्रति लोगों की उत्सुकता को मानो पर लगा दिए हैं। वैसे भी भारत देश में नागरिक अनगिनत टैक्सों के जाल से घिरा सा हुआ था। इस माहौल में एक देश एक टैक्स टैगलाइन ने विगत एक महीने में लगभग हर मन पर दस्तक दे दी हैं।

जी एस टी सरकार द्वारा तैयार उस दवाई की पुड़िया की तरह है, जिसे लेने से अनगिनत और दवाई की पूड़ियों से मुक्ति मिल सकती हैं। केंद्र सरकार अभी तक अलग अलग वस्तुओं पर उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त उत्पाद शुल्क, अतिरिक्त सीमा शुल्क, विशेष अतिरिक्त शुल्क वगैरह वगैरह टैक्स लगाए जाते थे और सेवायों पर सेवा कर लगाया जाता था। वही राज्य सरकारों द्वारा केंद्रीय बिक्री कर, वैट, खरीद कर, मनोरंजन कर, चुंगी, लाटरी टैक्स, प्रवेश कर न जाने कितने ही और टैक्स लगाए जाते थे। इस सब के बाद भी केंद्र एवं राज्य सरकारों के और सेस या अधिभार भी लागू होते थे। जी एस टी इन सभी का इकलौता विकल्प बन कर सामने आया हैं। अब हर वस्तु और सेवा पर एक टैक्स जी एस टी लगेगा और प्रत्येक वस्तु पर इसकी दर पूरे भारत मे एक ही रहेगी। अतः यह टैक्स सम्पूर्ण भारत को एक एकीकृत राष्ट्रीय बाजार के रूप में स्थापित कर देगा और दोहरे कराधान की समस्या पर करारी चोट करने का मुख्य औज़ार बनेगा।

जी एस टी प्रक्रम में तय पांच दरों 0%, 5%, 12%, 18% एवं 28% ने आम उपभोक्ता पर कारों के बोझ में कमी का रास्ता प्रशस्त किया हैं। वर्तमान की तरह ही जी एस टी प्रक्रम में भी एक्सपोर्ट यूनिट्स के लिए विशेष सुविधाएं बानी रहेगी। एक्सपोर्ट आइटम पर देश के अंदर लगे हुए सभी टैक्स का रिफंड देने की सुविधा दी गयी हैं। आयात के मामले में भी आयातित वस्तु पर सीमा शुल्क के अलावा उतना ही जी एस टी लगेगा जितना जी एस टी उस वस्तु के लिए भारत में नियत किया गया हैं। जी एस टी प्रक्रम में सभी व्यवसायियों चाहे वो व्यापारी हो या उत्पादक सभी को एक ही तरह की टैक्स प्रक्रिया करनी पड़ेगी। उसमे भी 20 लाख से ज्यादा टर्नओवर वाले व्यवसायियों को ही जी एस टी रजिस्ट्रेशन कराने एवं टैक्स देने की आवश्यकता है।

जी एस टी में हर व्यवसायी को महीने में एक बार रिटर्न भर कर टैक्स चुकाना होगा। चूँकि रिटर्न भरने की प्रक्रिया पूर्णतः ऑनलाइन हैं, अतः किसी भी माल या सेवा के ऊपर जो भी टैक्स लगता है उसमें खरीदारी पर लगा हुआ टैक्स का इनपुट टैक्स क्रेडिट स्वतः ही व्यापारी को मिल जाता है। जी एस टी नेटवर्क के द्वारा दी गई एक्सेल शीट में हिसाब रख कर, इसे सीधे एक ऑफलाइन टूल की सहायता से रिटर्न में बदला जा सकता हैं।

जो व्यापारी अपना सामान सीधा उपभोक्ता को बेचता है तो उसे केवल सामान की दर सहित टर्नओवर दिखाना होगा। और यदि कोई व्यापारी जिसका टर्नओवर 50 लाख तक है वो कम्पोजीशन स्कीम का फायदा उठा सकता हैं जिसके तहत उसे तीन महीने में कुल टर्नओवर दिखाते हुए रिटर्न भरना होगा। लेकिन जो व्यापारी दूसरे व्यापारी को माल बेच रहा हैं, उसे बिक्री के हर इनवॉइस की जानकारी रिटर्न में देनी होगी। व्यापारी से व्यापारी माल बिक्री के व्यवस्था में इनपुट टैक्स क्रेडिट रिवर्सल यानी व्यापारी को मिली इनपुट टैक्स क्रेडिट को लौटाने की व्यवस्था भी दी गयी हैं।

जी एस टी टैक्स व्यवस्था चूंकि पूर्णतया ऑनलाइन हैं, अतः यह एक पारदर्शी व्यवस्था हैं। यह भारत की अर्थव्यवस्था के शुद्धिकरण का एक महत्वपूर्ण औज़ार साबित हो सकती हैं। इस प्रक्रम के साथ साथ हमे भी अपने प्रत्येक व्यापारिक गतिविधि के निष्पादन में शुद्धि बरतनी चाहिए, तभी हम जी एस टी का पूर्ण लाभ फलित होते हुए देख पाएंगे।

Saturday, 10 June 2017

किसान

इस कृषि प्रधान देश में जब किसान आंदोलन या किसान की मौत होती है तो मन विचलित हो जाता हैं। सोचने की बात हैं कि हम किस प्रगति की बातें हांक रहे हैं। बचपन मे पढ़ाया जाता था कि भारत एक कृषि प्रधान देश हैं जिसकी 80% जनसंख्या कृषि पर निर्भर हैं। आज ये आंकड़ा महज 52% पर आ कर अटक गया हैं। कृषि क्षेत्र घट रहे हैं और कृषक भी। एक लेख पड़गा था अभी की आज भी विभिन्न फसलों के दाम दस वर्ष पूर्व के दामों से दुगुना भी नहीं हुए है वहीं आय से लेकर अन्य सामानों के दाम कई गुना बढ़ गए हैं। बात सच भी हैं। पर क्या कारण है कि किसानों को आजादी के इतने वर्षों के बाद भी जायज हक नहीं मिल पाया। उसमे भी ताज्जुब यह है कि पहली संसद से लेकर आज तक हर संसद में पहुंचे हुए जन प्रतिनिधियों के एक बहुत बड़े हिस्से का राजनीति के अलावा केवल कृषि व्यवसाय रहा है। भारत में राजनीति तो केवल जनता की सेवा मात्र है, उससे कुछ कमाना तो लानत हैं। अब केवल कृषि व्यवसाय पर निर्भर रहकर न जाने कितने ही जन प्रतिनिधि अपनी संपत्ति को कितने सैंकड़ो गुना कर चुके हैं। वहीं आम किसान पता नहीं क्यों अपने परिवार को पालने में असमर्थ रहे हैं और अपनी जान देते रहे हैं। बात हिसाब रखने की हैं। जब तक एकाउंटेबिलिटी नहीं होती, तब तक उस मुद्दे पर कोई वार्तालाप भी नहीं होता हैं। इसी आड़ में बाहुबली किसान अपनी टैक्स फ्री कृषि आय साल दर साल कई कई गुना बढ़ाते हुए तंत्र से भी ऊपर निकल गए हैं वहीं उसी कृषि क्षेत्र के दूसरे किसान अपने परिवार को पाल भी न पाने की स्थिति से दो चार हो कर अपनी जान देने को विवश हो जाते हैं। काश वो बाहुबली किसान अपनी सफल कृषि तकनीकी जैसे बीज चयन  से लेकर खाद, सिचाई की उन्नत तकनीकी का राज अन्य किसान भाइयों से भी साझा कर लेते तो , शायद ये दिन न देखना पड़ता। फिर एक बात ये भी ख्याल में आती है कि जो कृषि से लगातार लाभ प्राप्त करते हुए अकूत संपत्ति जोड़ पा रहे हैं ऐसे तथाकथित किसानों से टैक्स वसूल कर गरीब किसानों के लिए कोई फण्ड बना देना चाहिए, ताकि भविष्य में किसानों की जान  की आहुति को रोका जा सके ।

Tuesday, 23 May 2017

मिलनसार

एक वृद्ध लंगड़ाते हुए अपनी दुकान की तरफ बढ़े चले जाते थे।थोड़ा हाँफते हुए , थोड़े थोडे अंतराल पर बैठते बैठाते अपना रास्ता नाप लेते थे। उनके भाई का बेटा राजु रोज उनके समानान्तर अपनी बाइक दौड़ाता हुआ निकल जाता था। फिर एक दिन वृद्ध बीमार होकर खटिया पर लेट गए। लगने लगा कि वो बस चंद दिनों के मेहमान है। वृद्ध को अस्पताल में भर्ती करवाने में राजू मुख्य मददगार था। ये बाय और कि उसे तीमारदारी से कोई सरोकार नहीं था। तीन दिनों बाद, वृद्ध दुनिया छोड़ गए। राजू कंधे देने वालों में सबसे आगे था। उसने मृत्यु पश्चात की रस्मों से लेकर भोज तक की सारी व्यवस्थायों में अपनी जी जान लगा दी। आखिर में सभी ने कहा कि राजू जैसे मिलनसार युवा समाज मे विरले ही बचे हैं।

Tuesday, 9 May 2017

बिकाऊ बनो

आज का युग भौतिकतावादी मूल्यपरक युग हैं। इस मूल्यपरक युग मे हर वस्तु, यहां तक की मनुष्य भी मूल्य के द्वारा आंका जाता हैं। यूँ तो सदा से ही समाज मे मूल्य निर्धारण होता रहा है। लेकिन वर्तमान में सामाजिक मूल्यों को पूर्णतया नकार कर समाज पूर्णरूपेण मूल्यपरक हो चुके हैं। समाज बाजारू संस्कृति पर संचालित होने लगे हैं, जहां महंगी वस्तु का मतलब अच्छा होने से हैं। यहां समाज का परिप्रेक्ष्य सीमित न होकर पूर्णतया विस्तृत हैं। पूरे देश मे बिकाऊ होना सफलता का मूल सूत्र हो गया हैं। जप बिकने में सफल हो गया, समझो वहीं सच मे चर्चित है, सफल हैं।

आज बिकाऊ होना उतना ही जरूरी हैं, जितना खाने में नमक का होना। यदि आप बिकाऊ हैं, तो समाज को आपसे सरोकार हैं, अन्यथा न जाने कितने ही कुकुरमुत्ते बरसात में उगते है और खत्म हो जाते हैं। लेकिन बिकना भी इतना आसान नहीं है। आज बिकाऊ होने के लिए लगातार मूल्य वृद्धि (वैल्यू एडिशन) की आवश्यकता हैं। नए नवेले बिकाऊओ के लिए तो बिकना और भी मुश्किल हैं। लेकिन जिधर देखो, वहां बिकाऊओ के लिए दलाल तंत्र तैयार हैं। बिकाऊओ का बाजार पूर्णतया तैयार हैं। चाहे आप नौकरी करने के लिए स्वयं को बेचना चाहते हो या शादी के बाजार में, दलाल तंत्र हर जगह मौजूद हैं। आप स्वयं बिक रहे हैं, तो अच्छा हैं अन्यथा आप स्वतः बिक जाएंगे या फिर कबाड़ी माल की तरह खाप जाएंगे।

व्यवसाय या नौकरी के क्षेत्र में, 'बिकाऊ बनो' का एक उज्ज्वल  तार्किक पक्ष हैं। आज के समय मे आप को अपने आप को बिकाऊ बनाना ही होगा, अपने अंदर समाज में आवश्यक सफलता के गुणों को समाहित करके। आज इतनी प्रतिस्पर्धा है कि यदि आप कुछ अलग नहीं, तो आपकी परवाह भी किसी को नहीं। व्यवसाय में आज वस्तु नहीं बिकती, वरन उसके साथ व्यापारी को भी बिकना होता हैं।यहां इसका स्पष्टतया अर्थ है कि व्यवसायी को बहुत व्यवहारिक, मधुर व क्रेतान्मुखी (कस्टमर ओरिएंटेड) होना अत्यन्य जरुरी हैं। आज समाज मे इतना दलाल तंत्र है कि आप के बिकाऊ होने में इनका योगदान होने को नकारा ही नहीं जा सकता हैं। कहीं इनका नाम प्लेसमेंट एजेंसी है तो कहीं जॉब ब्यूरो, लेकिन ये प्रभु समान सर्वव्याप्त हैं। अतः मूल मंत्र है कि 'बिकाऊ बनो', चाहे अपने बूते पर या फिर दलाल तंत्र की बैसाखियों पर।

शादी के बाजार में भी बिकाऊ दूल्हों की मांग है, जो बिकना नहीं चाहते, उनमे समाज कुछ न कुछ खोट ढूंढ ही लेता हैं। नैतिकता और मूल्यों का स्थान पैसे से भरने की समाजों की कोशिशें लगातार प्रचारित व प्रसारित हो रहीं हैं।परिचय सम्मेलन लगभग हर समाज के फैशन शो हो गए है, हालात यहां भी वहीं है, बिकाऊ माल केवल आयोजक हैं और न बिकने वाले माल की नुमायश एक सम्मेलन से दूसरे सम्मेलन तक हो रही हैं व सिलसिला चला जा रहा हैं। तो अच्छा है कि 'बिकाऊ बनो'।

Friday, 21 April 2017

गोवर्धन परिक्रमा : एक अलौकिक यात्रा

गोवर्धन एक जन मानस की आस्था का केंद्र हैं. गोवर्धन ब्रज क्षेत्र में अवस्थित एक छोटी सी पर्वतमाला हैं. इसके बारे में किवंदती है की इसे भगवान श्री कृष्ण ने द्वापरयुग में अपनी बाल लीलाएं करते हुए अपनी छुटकी अंगुली पर उठाकर देवराज इंद्र के दंभ का नाश किया था. कहा जाता है की पांच हजार वर्ष पूर्व यह गोवर्धन पर्वत तीस हजार मीटर ऊंचा होता था, जो पुलस्त्य ऋषि के श्राप के कारण तिल तिल घटते हुए आज मात्र तीस मीटर ही ऊंचा रह गया हैं. गोवर्धन के नजदीक का होने के कारण मेरा सदा गोवर्धन जी के लिए के नजदीकी स्थान रहा है. अतः गोवर्धन परिक्रमा में शामिल होने के निमंत्रण मात्र से मेरा मन झूमने लगा था. यूं तो दूरी वश एवं तेज पड़ती गर्मी किसी भी यात्रा के विचार को नेस्तनाबूद करने के लिए पर्याप्त थी, लेकिन गोवर्धन परिक्रमा एक अलौकिक यात्रा का विचार था जो अपने आप पूर्ण होने जा रहा था.

गोवर्धन परिक्रमा को दो भागों में विभाजित किया जाता हैं, जिसके मध्य में गोवर्धन दान घाटी मंदिर है. गोवर्धन दान घाटी से आन्यौर, पूछरी, जतीपुरा होते हुए पुनः गोवर्धन आने की परिक्रमा बड़ी परिक्रमा कहलाती है, जो की लगभग बारह किलोमीटर की होती हैं. वहीँ गोवर्धन से उद्धव कुंड होते हुए राधा कुंड, मानसी गंगा होते हुए पुनः गोवर्धन आने की परिक्रमा छोटी परिक्रमा कहलाती हैं, जो की लगभग नौ किलोमीटर की हैं. वैष्णव संप्रदायी लोग सामान्यतः अपनी परिक्रमा गोवर्धन दान घाटी मंदिर से ना आरम्भ करके, मुखारविन्द जतीपुरा से प्रारंभ करते हुए पुनः जतीपुरा पहुँच कर अपनी परिक्रमा पूर्ण करते हैं, जिसका अनुसरण हमने किया.

आज के समय एक निश्चित तय समय पर इक्कीस लोगों (बच्चों सहित) का एकत्रित होने लगभग नामुमकिन हैं, जो गोवर्धन महाराज की इच्छानुसार पूर्ण हो रहा था. हम सभी परिवारजन श्री अम्बेडकर जयंती के अवसर पर छुट्टी का लाभ उठाते हुए जतीपुरा एकत्रित हो गए. जतीपुरा के मुखारविंद मंदिर के समीप एक रिहायशी ठिकाने को हमने गिरधर नगरी में अपना अस्थायी आशियाना बना लिया. तपती गर्मी के मद्देनजर हमने अपनी गोवर्धन परिक्रमा के आगाज़ का समय सांय आठ बजे का तय किया. तय समयानुसार सांय साढ़े सात बजे मुखारविंद पर आरती में शामिल होने के साथ ही हमने गोवर्धन बाबा, गिरिराज धारण, मुखारविंद, कृष्ण कन्हैया लाल आदि आदि जयकारों के उदघोष के साथ परिक्रमा का शुभारम्भ किया. बच्चों के साथ के कारण हमने एक रिक्शा को अपने साथ ले लिया जिसमे हमने पानी, कपडे वगैरह दुसरे सामान भी रख लिए. श्रद्धानुसार मुझ सहित कुछ परिवारजनों ने नंगे पाँव ही परिक्रमा करना स्वीकार किया. हमारे साथ ही बच्चों का भी परिक्रमा के लिए जोश देखते ही बनता था.

जतीपुरा वल्लभ संप्रदाय का एक प्रमुख केंद्र रहा हैं. श्री वल्लभाचार्य एवं विट्ठल नाथ जी की यहाँ बैठके हैं. यहाँ श्रीनाथजी का प्राचीन मंदिर हैं, जो अब जीर्ण शीर्ण अवस्था में हैं. कहा जाता है की अष्टछाप के महा कवि एवं भक्त शिरोमणि सूरदास यही कीर्तन किया करते थे.
इक्कीस किलोमीटर लम्बी परिक्रमा लगाना अन्य किसी व्यायाम या मैराथन से भी दुष्कर प्रतीत होता हैं और विशेषतः तब जब वह परिवार के साथ की जाए. सबकी शारीरिक क्षमताओं का संतुलन बैठाते हुए लय बनाये रखते हुए परिक्रमा को पूर्णता की ओर ले जाना भी एक कला जैसा हैं. राह में यहाँ वहां अनेकानेक श्रद्धालु दंडवत परिक्रमा भी कर रहे थे, जिनकी श्रद्धा किसी को भी विस्मृत कर सकती हैं. लेकिन यहीं उदाहरण हैं की श्रद्धा की कोई सीमा नहीं होती हैं, और जब श्रद्धा आपके मन में हो तो, कोई भी शारीरिक बंधन आपके आड़े नहीं आ सकता हैं.  इन श्रद्धालुयों का भाव ही था जो हमारे मन में भी जोश भर रहा था.
किलोमीटर दर किलोमीटर, भजन-कीर्तन करते हुए, यदा-कदा बतियाते हुए और समय समय पर जयकारों से जोश भरते हुए हम परिक्रमा पथ पर बढे जा रहे थे.
चूंकि हमने परिक्रमा जतीपुरा से प्रारंभ की थी, तो हमारी बड़ी परिक्रमा जतीपुरा से दानघाटी की हो गयी जो लगभग तेरह किलोमीटर होती हैं.  मध्य में मुख्य पड़ाव, राधाकुंड एवं मानसी गंगा थे. राधाकुंड के बारे में मान्यता है की यहाँ श्री कृष्ण ने अष्ट सखियों संग महारास रचाया था. राधाकुंड के बारे में यह भी कहा जाता है की अगर निस्संतान दंपत्ति यहाँ एक साथ स्नान करें तो उन्हें संतान सुख की प्राप्ति का आशीर्वाद अवश्यम्भावी हैं. राधाकुंड के बगल में ही श्री कृष्ण कुंड है जिसकी बनावट श्री कृष्ण की तरह की बांकी यानि टेढ़ी हैं. राधाकुंड पर हमने भी राधा जी एवं कृष्ण के अगाध प्रेम को याद करते हुए अपनी मनोकामनायों को ह्रदय में दुहराते हुए दीप प्रज्वलन कर पूजा अर्चना की.  
वही मानसी गंगा के बारे में मान्यता है की इसे कृष्ण भगवन ने अपने मन से उत्पन्न किया हैं. किंवदती है की एक बार नन्द बाबा और यशोदा मैया ने गंगा जी की यात्रा का विचार जताया और जाते जाते थक जाने पर श्री कृष्ण ने अपने मन के विचार मात्र से गंगाजी का आवाहन गोवर्धन में कर दिया. यहाँ की गयी मनौती कभी विफल नहीं जाती.
परिक्रमा मार्ग में अन्य पड़ावों में उद्धव कुंड, कुसुम सरोवर इत्यादि भी हैं. जहाँ श्री कृष्ण से साक्षात्कार के साथ की उत्कृष्ट स्थापत्य का नमूना भी देखने को मिलता हैं.
दान घाटी पर रात्रि परिक्रमा के मद्देनजर भगवान की सुन्दर छवि के दर्शन तो संभव नहीं थे अतः हम भगवान को सुमिरते हुए छोटी परिक्रमा की और बढ़ चले. अब कुछ बच्चे गोदियों में चढ़ कर नींद निकालते हुए परिक्रमा पथ पर अग्रेसित थे तो कुछ अभी भी जोश से सरपट दौड़े जा रहे थे. कुछ बच्चे यदा कदा रिक्शा से भी परिक्रमा का लाभ उठा रहे थे. दान घाटी से जतीपुरा की परिक्रमा के मुख्य पड़ाव आन्यौर एवं पूछरी का लौठा हैं. पूछरी के लौठा के बारे में मन जाता है की श्री गोवर्धन का आकार एक मोर के सदृश हैं एवं श्रीराधाकुंड उनकी जीभ एवं श्री कृष्ण कुंड चिवुक हैं , ललिता कुंड ललाट हैं. वही यह पूछरी, नाचते हुए मोर के पंखों – पूँछ के स्थान पर अवस्थित हैं अतः इसका नाम पूछरी हैं. यहाँ यह भी किंवदती है की लौठाजी भगवान श्री कृष्ण के परम मित्र थे, जिन्हें श्री कृष्ण ने मिलने आने का वचन दिया था. और लौठाजी आज भी वही मंदिर में भगवान श्री कृष्ण से मिलने का इन्तजार करते हैं.
पूछरी से आगे चलते हुए, पैर लगभग जवाब देने लगे थे. लेकिन गोवर्धन महाराज की श्रद्धा ही शायद भक्तगणों को आगे खींच रही थी. जतीपुरा पहुँच कर भक्तगणों ने गोवर्धन महाराज को धन्यवाद देते हुए परिक्रमा को विराम दिया. सभी ने विश्राम किया.
परिक्रमा की पूर्णाहुति के रूप में मुखारविंद जतीपुरा पर गोवर्धन महाराज के भोग व विशेष पूजा अर्चना का नियत था. सभी परिवारजनों ने एक साथ गोवर्धन महाराज को दुग्ध स्नान एवं भोग अर्पण किया. गोवर्धन बाबा के जयकारों, भजन कीर्तनो एवं बैंड बाजों के साथ ने इस पूजा को अविस्मरणीय बना दिया. गोवर्धन बाबा से सामीप्य हमारे दिलों में हिलोरें मार रहा था. सभी के चेहरों पर एक अलौकिक चमक प्रत्यक्षतः गोवर्धन महाराज के आशीर्वाद का प्रत्यक्ष अनुभव करा रहा था. गोवर्धन बाबा के प्रसाद को प्राप्त करके हम सभी कृतज्ञ मन से गोवर्धन बाबा को धन्यवाद देते हुए अपनी जिंदगी की उहापोह का सामना करने पुनः निकल पड़े.

Tuesday, 18 April 2017

जन्मदिन की हल्की फुल्की शायरी

जन्मदिन मुबारक हो, आज मेरे यार
खुशियों का अंबार हो, आज तेरे द्वार
हम नहीं पास, ये मलाल हमें यार
पर पाकर sms, बधाई कर लेना स्वीकार
.................................................

जश्न जोरों से जरा कर,
            आगाजे जन्मदिन करते हैं हम
लाखों साल तक जियो तुम,
            बस दुआ आज ये करते हैं हम
.................................................

दुआ करे क्या तेरे लिए,
             तू दुआ खुदा की हमारे लिए
बस लाखों साल तक तू जिये,
            बस चाह यही अब सदा के लिए
.................................................

रवि रश्मि की तरह,
              बढती जाए जिंदगी तेरी यार
सागर की लहरों की तरह,
              बढ़ता जाए अपना प्यार
.................................................

Tuesday, 4 April 2017

लचीलापन

व्यवहार में लचीलापन होना अच्छे व्यक्तित्व की निशानी हैं. देखा भी जाता है की सामान्यतः सीधे खड़े हुए दरख़्त जरा से हवा के झोंकों से जमींदोज हो जाते हैं. वही लचीले वृक्ष सदा फलों से लदे रहते हैं. आज पीढ़ी समागम का अभाव समाज में बहुतायत में दिखाई देता हैं. आज जब समाज सिद्धांतों से विकास की ओर अग्रसर हो रहे हैं, तो पीढ़ी समागम सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक हैं. अन्यथा पीढ़ी समागम का अभाव इस समाज को कुरुक्षेत्र में परिवर्तित कर देगा, जिसमे न जीतने वाला सुखी होगा न ही हारने वाला. अभी हाल में आई हुई फिल्म बद्रीनाथ की दुल्हनिया में भी इसी समस्या का चित्रण किया गया हैं. लेकिन फिल्म होने के नाते इस में पीढ़ी समागम का उपाय इतने सरलता से मिलता दिखाया गया हैं, जिसे पचाना नामुमकिन सा हैं. आज में महाभारत की कहानी को जेहन में दोहराता हूँ तो मुझे उसका मूल कारण धृतराष्ट्र का अंधापन, उसका पुत्र प्रेम, दुर्योधन की महत्वाकांक्षा से ज्यादा भीष्म की दृढ प्रतिज्ञा दिखाई देती हैं. भीष्म के आचरण में कोई भी लचीलापन महाभारत को रोक पाने का सार्थक प्रयास हो सकता था. भीष्म की दृढ प्रतिज्ञा ने, तत्कालीन माहौल के हिसाब से ढल जाने की संभावनायों को नकार कर उन्हें एक जीता जाता लक्खड दरख़्त बना दिया था, जिसका गिरना अवश्यम्भावी था. और उन्ही के साथ उनके संबद्धों का भी पतन अवश्यम्भावी था. अतः परिस्थितियों के अनुरूप ढलकर ही परिस्थितियों का सामना किया जा सकता हैं. समस्याएं तब जन्म लेती है जब दो पक्ष व्यवहार में लचीलापन छोड़कर परिस्थिति की आड़ में आपस में ही दो-दो हाथ करना शुरू कर देते हैं. परिवारों में अलगाववाद की समस्या विकराल रूप ले रही हैं. समाज को लचीलेपन की आवश्यकता को समझना चाहिए. इन्सान की सोच परिस्थितियों से उनकी भिडंत से सीख मात्र हैं, लेकिन उसी को एक मात्र राह मान लेना सरासर गलत हैं. यदि भूतकाल में सीखा गया ज्ञान ही एक मात्र सच होता तो नए विकास की संभावनाएं न जाने कहा खो जाती और शायद आज भी हम आदि-पाषाण या पाषाण युग में जी रहे होते. इसीलिए निरंतर नव प्रवर्तन की सोच लेकर लचीलापन धारण करके ही सार्वभौमिक विकास की उम्मीद लगे जा सकती हैं. सभी को अपने भूतकाल के संघर्ष और उन पर विजय पर ख़ुशी रहने या खुश होने का पूरा अधिकार हैं, लेकिन उसकी कीमत किसी और से वसूलने की चाह करना बेमानी हैं. वर्तमान सभी के भूतकाल के प्रयासों का ही फल हैं. साथ ही अपने दृढ नियमों की पालना करते समय हमें दूरदर्शी भी होना चाहिए. ऐसा न हो की आज के हमारे दृढ नियम कल हमारे पैरों की जंजीर न बन जाए. अंतत लचीलापन छोड़ कर हम सुखद होने की कामना नहीं कर सकते हैं. और दृढ प्रतिज्ञ रह कर हम स्वयं को एकाकीपन के घनघोर अंधकार में डालने का काम करेंगे. व्यवहार में लचीलापन ही पीढ़ियों को नयी पीढ़ियों से जोड़ने के गोंद का काम करता हैं. वही लचीलेपन का अभाव पीढ़ियों के मध्य खाई बना सकता हैं जिसका भरना भी शायद ही संभव हो. अतः लचीलापन अपना कर ही हम अपने एवं अपनी भावी पीढ़ियों के सुखद भविष्य की कामना कर सकते हैं.  

Friday, 31 March 2017

बैलेंस शीट : The Account Statement

आज एक और विशिष्ट वित्तीय वर्ष ख़त्म हो रहा है। विशिष्ट इसलिये की, इस वर्ष विमुद्रिकरण  से लेकर जी एस टी विधेयक समेत न जाने कितनी घोषणाएं हुई। एक शाम तो अचानक ही सब की धड़कने सी रूक गयी, जब माननीय प्रधानसेवक मोदीजी ने मध्यरात्रि से पांच सौ और एक हज़ार रुपये के नोट बंद करने की घोषणा कर डाली। किसी भी वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर सभी अपने आय व्यय के चिट्ठे लेकर बैलेंस शीट बनाने के भागीरथ प्रयास में लग जाते हैं। मैं भी अपने पुराने साल भर के चिट्ठे पत्रे खंगाल रहा थी की यकायक ख्याल आया। इस जिंदगी में भी हम रोज न जाने कितने आचार व्यवहार करते है। पर क्या कभी हमने सोचा है कि इसकी भी बैलेंस शीट बनानी चाहिए। पता नहीं जिंदगी के मामले में हम सब कुछ हमारे ऑडिटर  एवं इंस्पेक्टर चित्रगुप्त एवं यमराज जी पर कैसे छोड़ देते हैं। जिंदगी में हम अपने मद में न जाने कितने एसेट खो देते हैं, न जाने कितने रिश्तों की पूंजी गँवा देते हैं, न जाने कितनी बिमारियों को घर कर लेते हैं , और शायद की कुछ मित्रों, संबंधों को जमा कर पाते है, बचा पाते हैं। ये चक्र अनगिनत बार चलता रहता है, बिना किसी बैलेंस शीट के बनाये। जिंदगी में बैलेंस शीट न बनाने और मध्यवर्ती या वार्षिक आकलन न करने के कारण, अंतिम चरण में अपने आप को ठगा सा खड़ा पाते हैं। काश हम जिंदगी में भी वार्षिक आकलन का नियम बना ले। मित्रों, संबंधों के डेबिट को बचाने के प्रयास करे, उन्नति,स्वास्थ्य, व्यवहार के एसेट्स को बचाने और नित निरंतर बढ़ाने का प्रयास करें। व्यापार में भी अनगिनत बार ऐसे लम्हे आते हैं जब हमारे निर्णयों के मनचाहे परिणाम नहीं आते है और हानि भी होने लगती है पर तब बैलेंस शीट हमें अपने निर्णयों के परिणाम से आगाह करती हैं और हम अपने निर्णयों में फेर बदल कर बैलेंस शीट को दुरुस्त करने के प्रयास में लग जाते हैं। जिंदगी में भी न जाने कितने उतार चढ़ाव आते है, जिनके अनुरूप हम निर्णय लेकर आगे बढ़ जाते हैं, जिनके परिणाम आते है और हम उन्हें अनदेखा कर जिंदगी की उधेड़ बुन में आगे लग जाते हैं, बिना उस परिणाम का आकलन किये बिना। छोटे नयी सोच के पंखों से उड़ते हुए बिना बैलेंस शीट बनाये बड़ों के संस्कारों को दरकिनार करके आगे बढ़ते जाते हैं, तो बड़े अपनी पुरानी सोच को ही एकमात्र सत्य मान कर छोटों को खोते चले जाते हैं। काश चित्रगुप्त एवम यमराज जी, जिंदगी में भी वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को अनिवार्य कर दे। और शायद हमारी जिंदगी ज्यादा परिपूर्ण हो सके।

Sunday, 26 February 2017

छोटे तीर-३


जो सब्र मेरा था सुकून,

                वो कब्र मेरी बन गया हैं

जिनको चाहा खुद से बढ़के,

                वो क़त्ल करके चल दिए

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सरहदे सी पट गयी,

                  रिश्तों की कब्र सज गयी

छोटे हुए हैं नागवार

                  बड़ों को बड़ाई तन गयी

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Saturday, 25 February 2017

वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग)


वर्तमान युग पर्यावरणीय चेतना का युग हैं। आज मानव उन्नति की तरफ तेजी से दौड़ता जा रहा हैं।इस उन्नति की भूख में मानव ने प्राकृतिक स्त्रोतों का अंधाधुंध दोहन प्रारम्भ कर दिया हैं।इससे वर्तमान में पर्यावरणीय संतुलन बिगड़ने लगा हैं, जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण प्राकृतिक आपदाओं के रूप में गोचर हैं।पर्यावरण का अर्थ मानव के इर्द गिर्द प्रत्येक प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष चीजों से हैं जैसे वायु, जल, सूर्य की ऊष्मा, जीव-जंतु इत्यादि।पेड़ पौधे भी पर्यावरण का एक अभिन्न अंग हैं पर्यावरण संतुलन की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
वैश्विक तापन (ग्लोबल वार्मिंग):
वैश्विक तापन का सामान्य अर्थ पृथ्वी के औसत ताप में वृद्धि से लिया जा सकता हैं। पिछले २००वर्षों में पृथ्वी का औसत तापमान ०.७४ डिग्री सेंटीग्रेड की दर से बढ़ा हैं। पृथ्वी के तापमान का बढ़ना वैश्विक तापन का मुख्य मापक हैं।वैश्विक तापन को विश्व भर में सबसे बड़े खतरे के रूप में देखा जा रहा हैं।
वैश्विक तापन होने का प्रमुख कारण सूर्य से प्राप्त ऊष्मा का पृथ्वी पर अधिकतम संग्रहण हैं। सूर्य से प्राप्त ऊष्मा का अधिकांश हिस्सा पृथ्वी पर पड़ने के बाद परावर्तित होकर वापिस वायुमण्डल के बाहर चला जाता हैं पृथ्वी का एक नियत ताप (लगभग१६डिग्री सेंटीग्रेड) बना रहता हैं। पृथ्वी का सामान्य ताप (१६ डिग्री सेंटीग्रेड),पृथ्वी पर पाए जाने वाले जीव-जन्तुओ के लिए आवश्यक तापक्रम हैं। वर्तमान में हरित गृह (ग्रीन हाउस) गैसों की मात्रा बढ़ते रहने के कारण ये परावर्तित सूर्य की ऊष्मा को रोकने का काम करने लगी हैं। ये हरित गृह गैस पृथ्वी के चारों तरफ एक आवरण बना लेती हैं जो पृथ्वी से परावर्तित सूर्य की ऊष्मा को पृथ्वी के परिमंडल से बाहर नहीं निकलने देती हैं, जो पृथ्वी के औसत तापक्रम को बढ़ाने में उत्तरदायी होता हैं।
वैश्विक तापन के मुख्य कारण:
वैश्विक तापन का शाब्दिक अर्थ पृथ्वी के औसत तापमान का बढ़ना हैं।यह मुख्यतः जलवायु को परिवर्तित करने वाले आंतरिक एवं बाह्य दोनों तरह के कारकों से प्रभावित होती हैं।वैश्विक तापन के मुख्य कारणों का विवरण निम्न प्रकार हैं:
() आंतरिक कारण: जलवायु परिवर्तन को एक आंतरिक वजह अल-नीनो प्रभाव हैं। जिसके कारण वैश्विक तापन में जलवायु परिवर्तन की वजह से मदद मिलती हैं।
() बाह्य कारण: वैश्विक तापन के जिम्मेदार बाह्य कारणों में मुख्यतः वो कारण है, जो किसी किसी रूप में हरित गृह गैसों का सांद्रण बढाकर पृथ्वी के औसत तापमान में वृद्धि का कारण बनते हैं।ये मुख्यतः निम्न प्रकार हैं:
(i) मानव जनित हरित गृह गैसों का उत्सर्जन:
हरित गृह गैसों में मुख्यतः कार्बन-डाई-ऑक्साइड,मीथेन, ओजोन, क्लोरो-फ्लुओरो  कार्बन पर फ्लुओरो कार्बन इत्यादि आते हैं। मानव के द्वारा नित निरंतर बढ़ती उन्नति की भूख ने हरित गृह गैसों के सांद्रण में यकायक तेजी ला दी हैं।कार्बन-डाई-ऑक्साइड का सर्वाधिक उत्सर्जन जीवाश्मीय ईंधनों पर आधारित ऊर्जा संयंत्र करते हैं।इसका दूसरा सबसे बड़ा सृजक कल-कारखाने एवं वाहन हैं।
वही दूसरी और वातानुकूलित संयंत्रों एवं शीतलन संयंत्रों में उपयोगित क्लोरो-फ्लुओरो कार्बन पर-फ्लुओरो कार्बन गैसों ने भी हरित गृह गैसों का सांद्रण बढ़ाया हैं।
(ii) वृक्षों की कटाई:
उन्नति की चाह में निरंतर परिवर्तित भूमि उपयोग ने वृक्षों पर निर्मम प्रहार किया हैं, जो वृक्ष पर्यावरणीय संतुलन बनाये रखने का प्रमुख हैं।  वृक्षों की अंधाधुंध कटाई ने भी कार्बन डाई ऑक्साइड सांद्रण पर्यावरण में बढ़ दिया हैं, जो वैश्विक  तापन के लिए प्रमुख जिम्मेदार हैं।
वैश्विक तापन के प्रमुख प्रभाव:
वैश्विक तापन में जिस तरह पृथ्वी का औसत तापमान निरंतर बढ़ता जा रहा हैं, उसके प्रत्यक्ष प्रभाव निम्न प्रकार समझे जा सकते हैं।
() ध्रुवीय बर्फ का पिघलना- जिस गति से वैश्विक तापन हो रहा हैं, उससे यह अनुमान हैं की सन २०३० तक ध्रुवीय बर्फ़ों के पिघलने के कारण ही विश्व में समुद्र स्तर औसतन २५ सेमी तक बढ़ जायेगा। इसका अर्थ इस प्रकार समझा जा सकता हैं की तटीय देशों का अस्तित्व ख़त्म होने के कगार पर हैं।
() विशिष्ट जैविक प्रजातियों का विलोपन- वैश्विक तापन की वजह से भविष्य में ध्रुवीय भालू, बाल्टीय ओरियो (एक पक्षी) अनेकानेक प्रकार की मछलियों की कई विशिष्ट प्रजातियां विलुप्त हो जाएगी।
() कृषि पर प्रभाव- वैश्विक तापन की वजह से ऋतु चक्र में परिवर्तन परिलक्षित होने लगा हैं। शीतकाल में गर्मी का अनुभव होना इसका प्रत्यक्ष लक्षण हैं। ऋतु चक्र में परिवर्तन का कृषि पर सीधा असर पड़ता हैं। अतः वैश्विक तापन से ऋतु चक्र में परिवर्तन पर बुरा असर डालना प्रारम्भ कर चुका हैं, जो भविष्य में एक विकराल समस्या के रूप में खड़ा हो सकता हैं।
कृषि पर वैश्विक तापन के असर का प्रत्यक्ष उदाहरण हिमाचल की घाटियों में घटती हुयी सेव की फसल से लिया जा सकता हैं। वर्तमान में राष्ट्रीय कृषि संस्थान केद्वारा प्रस्तुत एक प्रतिवेदन के अनुसार सेवों के उत्पादन का क्षेत्र ३० किमी उत्तर की ओर खिसकचुका हैं।
() समुद्र तटीय क्षेत्रों की समाप्ति- वैश्विक तापन की वर्तमान दर को देखते हुए ऐसा अनुमान लगाया जा रहा हैं कि सन २०३५ तक भारत का प्रवेशद्वार मुंबई भी जल में विलीन हो जायेगा। विगत वर्षों में आये समुद्री चक्रवातों को इसी श्रृंखला की शुरुआत की तरह देखा जा रहा हैं।
()बढ़ते रेगिस्तान-वैश्विक तापन की वजह से ऋतु चक्र के परिवर्तन के प्रमुख प्रभाव के रूप में थार के रेगिस्तान के लगातार बढ़ते रहने को उदाहरण की तरह लिया जा सकता हैं।
वैश्विक तापन से बचाव के उपाय:
वैश्विक तापन के पप्राकृतिक कारणों (जैसे अल-नीनो प्रभाव) पर तो मानव का वश नहीं है, किन्तु वैश्विक तापन के मानव जनित कारणों के लिएबचाव ही उपायका सिद्धांत कारगर हो सकता हैं। वैश्विक तापन से बचाव के लिए प्रमुख उपाय निम्न प्रकार हो सकते हैं।
() वृक्षारोपण-प्रत्येक मानव वृक्षारोपण करके वैश्विक तापन के ख़िलाफ़ जंग का आगाज़ कर सकता हैं।एक वृक्ष कार्बन-डाई-ऑक्साइड के एक प्रमुख भाग को अवशोषित कर हरित गैसों का सांद्रण कम करने में मदद कर सकता हैं।
() अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संधि का पालन- प्रत्येक देश को इस विचार को छोड़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संधि का पालन करना चाहिए की वो वैश्विक तापन के लिए कितना जिम्मेदार हैं। वैश्विक तापन एक क्षेत्र विशेष की समस्या होकर सम्पूर्ण पृथ्वीवासियों की समस्या हैं, जिसका समाधान क्षेत्रीय भावना से प्रेरित होकर नहीं किया जा सकता हैं।
अतः अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरण संधि के अनुसार प्रत्येक राष्ट्र को हरितगृह गैसों के उत्सर्जन पर नियंत्रण के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लगातार प्रयत्न करने चाहिए एवं हरितगृह गैसों के उत्सर्जन की दर में उत्तरोत्तर कमी लाने की दिशा निरंतर प्रयासरत रहना चाहिए।
() ऊर्जा संयंत्रों में जीवाश्मीय ईंधन के उपयोग पर लगाम- हरित गृह गैसों के प्रमुख अवयव कार्बन-डाई-ऑक्साइड का प्रमुख उत्सर्जक जीवाश्मीय ईंधन पर आधारित ऊर्जा उत्पादक संयंत्र हैं, जिनकी भागीदारी लगभग २२प्रतिशत हैं।
ऊर्जा उत्पादन संयंत्रों के रूप हाइड्रो ऊर्जा संयंत्रों, सोलर ऊर्जा संयंत्रों, पवन ऊर्जा संयंत्रों आदि पर जोर देकर ऊर्जा की महती आवश्यकता की पूर्ति बिना वैश्विक तापन के की जा सकती हैं।
भारत में अक्षय ऊर्जा स्त्रोतों के विस्तृत संभावनाएं हैं भारत के अक्षय ऊर्जा स्त्रोतों से विद्युत् ऊर्जा परियोजनाओ को देखते हुए भारत की वैश्विक तापन के खिलाफ मजबूत भूमिका को समझा जा सकता हैं।
() वाहनों से उत्सर्जित हरित गृह गैसों पर लगाम- वाहनों में भी जीवाश्मीय ईंधन का उपयोग छोड़कर अन्य ऊर्जा स्त्रोतों का उपयोग हरित गृह गैसों के उत्सर्जन पर लगाम का एक प्रमुख उपाय बन सकता हैं।
वाहनों में हाइड्रोजन आधारित वाहनों, सी एन जी आधारित वाहनों, विद्युत् चालित वाहनों, सौर बैटरी आधारित वाहनों का समावेश वैश्विक तापन पर लगाम लगाने के लिए एक मुख्य औजार सिद्ध हो सकते हैं।
उपसंहार:
आज मानव इस दोराहे पर हैं की एक ओर उन्नति की चाह हैं वहीँ दूसरी ओर आदम सभ्यता की ओर मुड जाने की राह हैं। दोनों में संतुलन करके नित निरंतर नवीनतम तकनीकी के इस्तेमाल कर हम उन्नति की ओर अग्रसर होकर भी वैश्विक तापन पर नियंत्रण कर सकते हैं।वैश्विक तापन पर नियंत्रण के बिना हम अनायास ही विनाश की राह पकड़ लेंगे।सारांशतः प्रत्येक व्यक्ति वैश्विक तापन के खिलाफ जंग का सिपाही वृक्षारोपण के माध्यम से बन सकता हैं।


संतुलन- the balance

संतुलन व्यवस्था का दूसरा नाम हैं। संतुलन तराजू के दोनों सिरों के एक तल पर होने का भाव हैं। जीवन में भी संतुलन का महत्व हम सभी महसूस करते हैं...