एक वृद्ध लंगड़ाते हुए अपनी दुकान की तरफ बढ़े चले जाते थे।थोड़ा हाँफते हुए , थोड़े थोडे अंतराल पर बैठते बैठाते अपना रास्ता नाप लेते थे। उनके भाई का बेटा राजु रोज उनके समानान्तर अपनी बाइक दौड़ाता हुआ निकल जाता था। फिर एक दिन वृद्ध बीमार होकर खटिया पर लेट गए। लगने लगा कि वो बस चंद दिनों के मेहमान है। वृद्ध को अस्पताल में भर्ती करवाने में राजू मुख्य मददगार था। ये बाय और कि उसे तीमारदारी से कोई सरोकार नहीं था। तीन दिनों बाद, वृद्ध दुनिया छोड़ गए। राजू कंधे देने वालों में सबसे आगे था। उसने मृत्यु पश्चात की रस्मों से लेकर भोज तक की सारी व्यवस्थायों में अपनी जी जान लगा दी। आखिर में सभी ने कहा कि राजू जैसे मिलनसार युवा समाज मे विरले ही बचे हैं।
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Tuesday, 23 May 2017
Friday, 31 March 2017
बैलेंस शीट : The Account Statement
आज एक और विशिष्ट वित्तीय वर्ष ख़त्म हो रहा है। विशिष्ट इसलिये की, इस वर्ष विमुद्रिकरण से लेकर जी एस टी विधेयक समेत न जाने कितनी घोषणाएं हुई। एक शाम तो अचानक ही सब की धड़कने सी रूक गयी, जब माननीय प्रधानसेवक मोदीजी ने मध्यरात्रि से पांच सौ और एक हज़ार रुपये के नोट बंद करने की घोषणा कर डाली। किसी भी वित्तीय वर्ष की समाप्ति पर सभी अपने आय व्यय के चिट्ठे लेकर बैलेंस शीट बनाने के भागीरथ प्रयास में लग जाते हैं। मैं भी अपने पुराने साल भर के चिट्ठे पत्रे खंगाल रहा थी की यकायक ख्याल आया। इस जिंदगी में भी हम रोज न जाने कितने आचार व्यवहार करते है। पर क्या कभी हमने सोचा है कि इसकी भी बैलेंस शीट बनानी चाहिए। पता नहीं जिंदगी के मामले में हम सब कुछ हमारे ऑडिटर एवं इंस्पेक्टर चित्रगुप्त एवं यमराज जी पर कैसे छोड़ देते हैं। जिंदगी में हम अपने मद में न जाने कितने एसेट खो देते हैं, न जाने कितने रिश्तों की पूंजी गँवा देते हैं, न जाने कितनी बिमारियों को घर कर लेते हैं , और शायद की कुछ मित्रों, संबंधों को जमा कर पाते है, बचा पाते हैं। ये चक्र अनगिनत बार चलता रहता है, बिना किसी बैलेंस शीट के बनाये। जिंदगी में बैलेंस शीट न बनाने और मध्यवर्ती या वार्षिक आकलन न करने के कारण, अंतिम चरण में अपने आप को ठगा सा खड़ा पाते हैं। काश हम जिंदगी में भी वार्षिक आकलन का नियम बना ले। मित्रों, संबंधों के डेबिट को बचाने के प्रयास करे, उन्नति,स्वास्थ्य, व्यवहार के एसेट्स को बचाने और नित निरंतर बढ़ाने का प्रयास करें। व्यापार में भी अनगिनत बार ऐसे लम्हे आते हैं जब हमारे निर्णयों के मनचाहे परिणाम नहीं आते है और हानि भी होने लगती है पर तब बैलेंस शीट हमें अपने निर्णयों के परिणाम से आगाह करती हैं और हम अपने निर्णयों में फेर बदल कर बैलेंस शीट को दुरुस्त करने के प्रयास में लग जाते हैं। जिंदगी में भी न जाने कितने उतार चढ़ाव आते है, जिनके अनुरूप हम निर्णय लेकर आगे बढ़ जाते हैं, जिनके परिणाम आते है और हम उन्हें अनदेखा कर जिंदगी की उधेड़ बुन में आगे लग जाते हैं, बिना उस परिणाम का आकलन किये बिना। छोटे नयी सोच के पंखों से उड़ते हुए बिना बैलेंस शीट बनाये बड़ों के संस्कारों को दरकिनार करके आगे बढ़ते जाते हैं, तो बड़े अपनी पुरानी सोच को ही एकमात्र सत्य मान कर छोटों को खोते चले जाते हैं। काश चित्रगुप्त एवम यमराज जी, जिंदगी में भी वार्षिक रिपोर्ट प्रस्तुत करने को अनिवार्य कर दे। और शायद हमारी जिंदगी ज्यादा परिपूर्ण हो सके।
Thursday, 5 January 2017
लघु कथा: समय प्रबंधन
मैं अपने जीवन के कठिनतम समय से जूझ रहा था। मैं अपने आधिकारिक कार्यकाल मे मध्यम स्तर पर था, जिस समय आपसे अपने कार्य मे समय देने की अधिकतम आवश्यकता होती है। इस समय उम्र का भी वो पड़ाव था, जिसमे पारिवारिक दायित्वों के निर्वहन की महती ज़िम्मेदारी मेरे कंधो पर थी। एक ओर जहां छोटे बच्चे मुझसे अपना समय चाहते थे, वहीं दूसरी ओर मेरी वृद्ध माँ अपने लिए मुझसे वक्त चाहती थी। आधिकारिक कार्यों एवं अपने निजी पारिवारिक कार्यों मे संतुलन बैठाते बैठाते मैं एक अवसाद की स्थिति मे पहुँच चुका था। मेरा रक्तचाप उच्च रहने लगा। मैं अपने शरीर का बमुश्किल ही ध्यान रख पाता था। इस परिस्थिति मे हताशावश मैं चिड़चिड़ा सा होने लगा था। मेरे पास इतना भी समय नहीं होता था की मैं अपनी बाते किसी और से साझा करके अपना मन भी हल्का कर पाऊ। तभी अचानक एक दिन मेरी मम्मी के मामाजी के लड़के का फोन आया की वो नोएडा आ रहे है और एक-दो दिन हमारे साथ ही रहेंगे। मम्मी के मामाजी के लड़के मेरे मामाजी ही लगते थे और उन्हे मैं मामाजी कह कर ही संबोधित करता था। एक बार तो मुझे लगा की मैं मामाजी के लिए शायद ही समय दे पाऊ। लेकिन मामाजी ने इस अधिकार के साथ आने के बारे मे बताया की मैं चाह कर भी उन्हे टाल न सका। आखिर मामाजी हमारे घर आ पहुंचे। वो पहले दिन ही मेरी दिनचर्या देखकर घबरा गए। उन्हे बहुत क्षोभ था की मेरी हालत क्या हो रही है? उनका क्षोभ इस कद्र था की वह उनकी आँखों से साफ पढ़ा जा सकता था। आखिर सप्ताह मे सुकून का दिन शनिवार आ पहुंचा। इस दिन अपेक्षाकृत मैं थोड़े विश्राम मे था। मामाजी ने मुझे अपने पास बुलाया और एक खाली बड़ा जार लाने को कहा। फिर उन्होने कुछ बड़े और छोटे पत्थर मुझसे से मंगाएँ। मैं अचरज से मामाजी को देख रहा था, की ये मामाजी को क्या हो रहा है? मामाजी उम्र के लगभग छ दशक पार कर चुके थे। हमने उनकी बात कभी भी नहीं टाली थी। अतः उनके सम्मोहनवश मैं उनके कथनानुसार सारा समान लेकर आ गया।
मामाजी ने फिर उस जार को लेकर उसमे बड़े बड़े पत्थर डाल दिये और मेरी ओर देख कर बोले, बेटा क्या इसमे कोई जगह बची है। मैंने अनमने मन से मना कर दिया। तो फिर उन्होने अपने पास रखे छोटे छोटे पत्थरों को डाल कर जार को हिलाया, तो वो छोटे पत्थर भी उस जार मे समा गए। उसके बाद मामाजी ने कहा बेटा बताओ क्या इस जार मे और जगह है? मैं मामाजी के सम्मोहन को तोड़ते हुये अपने तार्किक दिमाग से बोला, हाँ मामाजी, अभी तो इसमे बहुत जगह खाली है। पत्थरों के बीच बची खाली जगह मे रेत आराम से समा सकती है। मामाजी ने कहा, “शाबाश”। मामाजी के कहने पर मैंने जार मे रेत भी डाल दी। रेत भी भरने के बाद, फिर मामाजी ने पूछा, क्या इस जार मे और जगह है? अब मेरा सुषुप्त मस्तिष्क जागृत हो चुका था, मैंने कहा, मामाजी अभी इसमे पानी भी आ सकता है। और मैंने जार को पानी से भर दिया और देखा की काफी पानी भी जार मे समा गया।
इसके बाद मामाजी ने विजयी मुस्कान के साथ मेरी ओर देखकर पूछा, बेटा इस कार्य कलाप से तुम क्या समझे हो। मैं अपने तार्किक तथ्यों के आधार पर बोला, मामाजी मैं यह सीखा हूँ की आप अपने व्यस्ततम समय मे भी अधिक से अधिक कार्यों को कर सकते है। जब हमे लगता है की अब बिलकुल भी समय नहीं है, तब भी कुछ न कुछ कार्यों को उसी समय मे और कर सकते हो।
मामाजी कुटिल मुस्कान के साथ हँसते हुये बोले, बेटा यहीं आप गलत हो। बेटा एक बात समझो, की जो बड़े पत्थर हमने जार मे सबसे पहले डाले थे, वो हम बाद मे नहीं डाल सकते थे। जार मे जिस क्रम मे हमने सामग्री डाली, उस क्रम को छिन्न करके हम, इस सभी सामग्री को जार मे नहीं समा सकते थे। मामाजी प्यार से मेरे सिर पर हाथ फेरते हुये बोले, बेटा सबसे पहले ज़िंदगी मे इन बड़े पत्थरों को समझना बहुत आवश्यक है। आपकी ज़िंदगी मे, आपसे महत्वपूर्ण कोई नहीं है। यदि आप स्वस्थ और सक्षम रहोगे, तो ही बाकी जिम्मेदारियों का निर्वहन कर पायोगे। बेटा, जिंदगी का बड़ा पत्थर है, तुम्हारा अपना स्वास्थ्य है। अतः पहले इस पर ध्यान दो। फिर अपने परिवार का ध्यान दो, जो आपके साथ आपकी हर विपत्ति मे साथ देता है। उसके बाद तुम रेत और पानी, यानि अपने व्यवसाय इत्यादि पर ध्यान दो। इस समय प्रबंधन से ही जीवन को सुगम बनाया जा सकता है।
मामाजी की इस सरल, सीधी सीख ने मेरा पूरा जीवन बदल दिया। मैंने अपनी दिनचर्या मे सुबह की सैर, परिवार के लिए समय, बच्चों के साथ खेल कूद, माँ के साथ मंदिर दर्शन, कार्यालय मे कार्य, सभी के बीच संतुलन कायम करने मे सफलता प्राप्त की। मामाजी के बुजुर्ग अनुभव ने मेरी काया पलट दी थी। लगातार दिनचर्या पर कायम रहकर मैंने अपने उच्च रक्त चाप पर भी नियंत्रण कर लिया। बुजुर्ग सच ही ज्ञान का एक ऐसा पिटारा है, जिसे हम जाने अनजाने बिना खोले छोड़ देते है।
मामाजी तो अपने दो दिन के प्रवास को समाप्त करके चले गए, लेकिन वो मेरे जीवन से सारे अवसादों का हरण करके ले गए। मामाजी के इस ज्ञान ने मेरे जीवन को एक नया आयाम दे दिया है, जिसका शब्दों मे बखान शायद ही संभव हो।
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